Thursday, 25 July 2019

बोलो कहाँ तक टिक सकोगे ?, यदि राम सा संघर्ष हो।

बोलो कहाँ तक टिक सकोगे ?, यदि राम सा संघर्ष हो।

सह ली सारी यातना पर,
कर्तव्य सर्वोपरि रखा।
त्याग, शील, संकल्प को,
जिस तरह जीवित रखा।
बोलो कहा तक टिक सकोगे ?,
यदि राम सा संघर्ष हो।
कल मुकुट जिस पर साजना था,
अब उसे सब कुछ त्यागना था।
निर्णयों के द्वन्द से,
एक बालपन का सामना था।
वचन भी था थामना,
आदेश भी था मानना।
किस तरह सोचो स्वयं को,
धर्म पर तुम रख सकोगे।
बोलो कहा तक टिक सकोगे ?,
यदि राम सा संघर्ष हो।
प्रजा तो बस राम की थी.
दुनिया उसे तो जप रही थी।
वचन ही था तोड़ देता,
धर्म ही था छोड़ देता।
पर पीढ़ियां क्या सीख लेंगी ?,
राम को चिंता यही थी।
हो छिन रहा एक क्षण मन सब कुछ,
सोचो एक क्षण क्या करोगे ?
बोलो कहा तक टिक सकोगे ?,
यदि राम सा संघर्ष हो।
केवट ने जाने क्या किया था,
सौभाग्य जो उसको मिला था।
राम से ही तारने को,
राम से ही लड़ गया था।
कुल वंश उसके तर रहे थे,
सब राम अर्पण कर रहें थे।
जब सब कुछ हो बिखरा हुआ,
इतने सरल कब तक रहोगे।
बोलो कहा तक टिक सकोगे ?,
यदि राम सा संघर्ष हो।
हैं याद वो घटना तुम्हें,
जब राम थे वनवास में।
सिया थी हर ली गई,
था कौन उनके साथ ,में ?
कुटी सब सुनी पड़ी थी,
दो भाई और विपदा बड़ी थी।
बोलो ऐसे मोड़ पर,
तुम धैर्य कब तक रख सकोगे ?
बोलो कहा तक टिक सकोगे ?,
यदि राम सा संघर्ष हो।
वह तो स्वयं भगवान था,
पर कहा उसमें मन था।
किरदार भी ऐसा चुना,
जिसमे सिर्फ बलिदान था।
मर्यादा के प्राण थे,
रघुवंश के अभिमान थे।
श्रीराम के अध्याय से,
एक पृष्ठ हासिल कर सकोगे ?
बोलो कहा तक टिक सकोगे ?,
यदि राम सा संघर्ष हो।
व्यथा इतनी ही नहीं हैं,
कथा इतनी से नहीं हैं।
कुछ शब्द उनको पूर्ण कर दे,
राम वो गाथा नहीं है।
जब तपे संघर्ष में,
तब हुए उत्कर्ष वो।
क्या तुम भी ऐसी प्रेणना ,
पीढ़ियों के बन सकोगे।
बोलो कहा तक टिक सकोगे ?,
यदि राम सा संघर्ष हो।
सह ली सारी यातना पर,
कर्तव्य सर्वोपरि रखा।
त्याग, शील, संकल्प को,
जिस तरह जीवित रखा।
बोलो कहा तक टिक सकोगे ?,
यदि राम सा संघर्ष हो।




- आशुतोष सिंह


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