प्रथम शैलपुत्री भवानी, स्नेह सुधा रस बरसाए।
धैर्य, शांति की दानी माता, भक्त विपद-हर जाए॥
ब्रह्मचारिणी तेज अनोखा, ज्ञान से जीवन महके।
तप से तप्त हृदय में माता, शीतलता बरसा रखे॥
चंद्रघंटा रण में कूदी, सिंह सवार विकराल बनी।
जो भी शत्रु बढ़ा सामने, रक्त धार से भूमि धनी॥
कूष्मांडा माँ सृष्टि विधाता, तेज से नभ को भरती।
सूर्य प्रभा सम रूप इनका, जो भी देखे, सुधरती॥
ममता की छवि संग विराजीं, स्कंदमाता दुलार करें।
भक्त पुकारे, माँ को ध्यावे, झोली सुख से तार भरें॥
कात्यायनी रण की देवी, शक्ति का संचार करें।
महिषासुर का मान हराकर, जग में नव आभार भरें॥
कालरात्रि क्रोध की ज्वाला, देख सुरासुर कांपे।
भक्त चरण में शीश झुकाकर, चरण-कमल पर लिपटे॥
महागौरी शांति स्वरूपा, रूप उजास अपार भरे।
जो भी प्रेम सुमन चढ़ावे, माँ के नयनों में नीर झरे॥
सिद्धिदात्री पूर्ण करुणा, नव निधि का संचार करें।
जो भी भक्त नमन कर लाए, भाग्य सुधा रस धार भरें॥
नव रूपों की ज्योति चमकती, पर्व नवरात्रि पावन हो।
डोले मृदंग, बजे घड़ियाली, माता की गूँजे वंदन हो॥
जय दुर्गे, जय माँ भवानी, शक्ति रूपिणी संकट हरो।
भक्ति सहित शीश नवाते, कृपा करुणा रस मन धरो॥
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-आशुतोष सिंह