वो अंधेरी काली रात
चुपके से एक इन्सान आया
हाथ उसने ओर बढ़ाया
डरी सहमी नींद से जागी
उठ खड़ी हो दूर वो भागी
नाकाम रही वो, पकड़ा था कसकर
एक हाथ पंहुचा सीने पर
दूजे से साध मुँह को दबाया
कान में फुस - फुसाकर
डर का माया जाल बनाया
आवाज कुछ पहचानी थी
वह थी उसके अपनों की
सहमी सिसकी पूरी रात
दर्द में तड़पी पूरी रात
लोग कहेंगे क्या? डर से
कभी नहीं कह पाती
लड़की एक स्यानी
अनकही - सी कहानी
किस्सा कैसे बताती
याद करके सहम जाती
दिखाती सीने के घाव कैसे?
तो इज्जत उसी की उछल जाती
सुनाओ कहानी सबकों ये
लड़की को सामान नहीं
सम्मान समझना
लोग कहेंगे क्या? डर से
मत सहना जिस्म पर
हाथ किसी का।
बन्द कमरा सहमी आवाज
वो अँधेरी काली रात
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