यह पद्य आठ भागों में क्रमशः है - जो इसी पद्य का भाग है, इसलिए सभी का एक साथ पाठन करे।
1. श्रद्धा
भाव तरंगित मन के भीतर,मौन पलों में गूँज उठी,
प्रिय स्मृतियों की मधुर सुरभि,
जैसे धरा पे मेघ झुकी।
नयनों में कुछ सपने जागे,
हृदय हुआ बेसुध, अधीर,
शब्द विहग बन उड़ते मन में,
प्रेम लहर का मधुर नीर ।
2. आशा
शीतल समीर सहलाने लगी,
कम्पित पत्तों की हरियाली,
नभ से झरते चांद उजाले,
बनते मन की मधुर लाली।
पलकों पर थी कोमल आशा,
सांसों में अनकहा गीत,
मन के मंदिर में दीपक-सा,
प्रेम जलाकर हुआ पुनीत।
3. स्मृति
हृदय गगन में स्वप्न सजे थे,
चुपके से कुछ कहती रात,
तारों की वह मौन झिलमिल,
जागे मन में मधुर बात।
बाँसुरी की धुन में खोकर,
थम गए सब व्याकुल भाव,
प्रेम की उस मधुर गली में,
बस गया अनजाना चाव।
4. विरह
चन्द्र किरण भी थककर सोई,
सागर लहरे मौन हुई,
मन की गहराई में फिर से,
प्रेम कथा अनुपम बही।
नभ से झरतें सपनों के रंग,
धरती ने भी अंग लगाए,
प्रेम पथिक बन, मैं अकेला,
तेरी राहों में खोता जाऊ।
5. वेदना
मौन निशा की छाव में बैठा,
चंचल मन कुछ कहने को,
स्वरहीन गीतों में डूबा,
तेरे रूप को गढ़ने को।
तरु की छाया शांत खड़ी थी,
शशि की किरणें गुप्त रही,
सांसे तक धीमी हो आई,
पलकों में स्मृतियां बही।
6. समर्पण
प्रणय सुधा का कण - कण लेकर,
मन पथिक नित भटक रहा,
तेरी छवि के रश्मि पथ पर,
प्रेम दीप फिर जगमग रहा।
हर धड़कन में गूँज रही है,
संग तेरे वो प्रिय पुकार,
काल भी झुककर नमन करे,
प्रेम बने अमर अपार।
7. आनंद
नभ में तारक दीप जले,
मन में उजियारा सा छाया,
तेरे चरणों में लिपटा प्रेम,
ज्यों पवन केश ने सहलाया।
श्वास स्वप्न हो, प्राण समर्पण,
तेरा प्रेम बस प्राण बने,
इस जीवन की हर गहराई,
तेरे चरणों की धूल तले।
8. अमरत्व
अब न कुछ कहना, न सुनना,
केवल तेरा ध्यान रहे,
तेरे प्रेम में खोकर प्रिय,
बस तेरा ही नाम रहे।
काल मिटे, सृष्टि सिमटे,
प्रेम धरा पर गूँज उठे,
तेरे संग यह जीवन मेरा,
अमर प्रेम बन झूम उठे।
आशुतोष सिंह
18.03.2025