Thursday, 23 May 2024

लड़की एक स्यानी : अनकही सी कहानी

बन्द कमरा सहमी आवाज
वो अंधेरी काली रात 
चुपके से एक इन्सान आया 
हाथ उसने ओर बढ़ाया 
डरी सहमी नींद से जागी
उठ खड़ी हो दूर वो भागी 
नाकाम रही वो, पकड़ा था कसकर
एक हाथ पंहुचा सीने पर 
दूजे से साध मुँह को दबाया 
कान में फुस - फुसाकर
डर का माया जाल बनाया 
आवाज कुछ पहचानी थी 
वह थी उसके अपनों की
सहमी सिसकी पूरी रात 
दर्द में तड़पी पूरी रात
लोग कहेंगे क्या? डर से 
कभी नहीं कह पाती 
लड़की एक स्यानी
अनकही - सी कहानी 
किस्सा कैसे बताती 
याद करके सहम जाती 
दिखाती सीने के घाव कैसे? 
तो इज्जत उसी की उछल जाती 
सुनाओ कहानी सबकों ये 
लड़की को सामान नहीं 
सम्मान समझना 
लोग कहेंगे क्या? डर से 
मत सहना जिस्म पर 
हाथ किसी का।
बन्द कमरा सहमी आवाज 
वो अँधेरी काली रात 

Tuesday, 7 May 2024

गिरगिट


मानव समाज का केंद्र बिन्दु है तो उसकी बातचीत उसे समाज में बने रहने का साधन है। मानव की बातचीत का माध्यम ही तय करता है कि वह केंद्र में होगा या नहीं। बातचीत के भी दो माध्यम होते हैं, जिससे दो विचारधाराओं का जन्म होता है - स्पष्टवादी 
                                             चाटुकार या चापलूस 

पहली विचारधारा उन मानवों कि है जो आज के समाज में विलुप्तता कि कगार पर हैं। ये ये लोग हैं जिनकी बातचीत स्पष्टवादिता का आँचल पकड़े हुए रहती है। जो आज के समाज और उनके लोगों को तीखी, नुकीली और कटुतापूर्ण लगती है। परंतु सत्य तो यह है कि इनकी बात में तथ्यों कि सत्यतता होती है. जो गिरगिट की तरह रंग बदलाव नहीं करती है यह अपने ही संत्य और स्पष्टवादिता के रंग में रंगी रहती है। बातचीत का झुकाव व्यक्तिपरक या स्थितिपरक न होकर तथ्यपरक होता है। ऐसे लोग आज के समाज और उनके लोगों को फूटी आँख भी नहीं सोहते हैं। आज के समाज ने ऐसे लोगों को मुँहफट की संजा दी है।

दूसरी विचारधारा, पहली विचारधारा के पूर्णतः विपरीत हैं। यह उन मानव की जाति है, जिनका स्पष्टवादिता और सत्यता से कोसो दूर का नाता नहीं है। इनकी बातचीत का झुकाव व्यक्तिपरक और समाजपरक होता है। यह समाज की स्थिति और लोगों की प्रस्थिति के अनुरुप गिरगिट की तरह अपने बातचीत का सुर बदल लेते हैं। ऐसे लोग अपना स्वार्थ साधना ही परम लक्ष्य मानते हैं।

आज के समाज में ऐसे ही लोगों का बहुमत है, और इन्हें चापलूस या चाटुकार की संज्ञा दी गयी है और इस कार्य को चाटुकारिता।

आज के समाज में पहली विचारधारा के लोग भूसे में सुई ढूँढने जैसे हो गए है। कमी केवल इस बात की नहीं की लोग स्पष्टवादी विचारधारा के नहीं, कमी इस बात की है की आज का समाज ऐसे लोगों को तवज्जो न देकर उन्हें कुंठापूर्ण हीन भावना से देखती है। आज के समाज चाटुकारिता के नशे में मदहोश है जिसका परिणाम यह हैं की चापलूसों या चाटुकारों का बगीचा फल-फूल रहा है।

ये (चापलूस या चाटुकार) लोग समाज और उसकी व्यवस्था के लिए उस मीठे जहर की तरह है जो धीरे धीरे जीवन को समाप्त कर देता है और यह लोग संबंध, समाज और उसकी व्यवस्था को समाप्त कर देते हैं।

Tuesday, 7 March 2023

आस्था (faith)


विश्वास भरे मन अधरों से, 
नारायण - भक्त पुकार किए ।

धर नरसिंह रूप रचयों, 
प्रकट भय खंड खम्भों से ।


देख नारायण रूप विकराल। 
मची सभा में हाहाकार, 

राज भवन की चौखट पर, 
रख जंघन पर चीर दिए ।


हिरण्यकश्यप - संहार किए
अहम् सब चकनाचूर हूए। 


- आशुतोष सिंह "चौहान" 

Monday, 31 October 2022

'मैं' जब 'हम' हो जावे ; 'आप' जब 'तुम' हो जावे।

'मैं' जब 'हम' हो जावे, 
'आप' जब 'तुम' हो जावे।
कोरी शून्य कल्पना का, 
चक्र टूट फिर जावे। 
मैं' जब 'हम' हो जावे, 
'आप' जब 'तुम' हो जावे।
मन शान्ति हो जावे, 
काया रंग फिर पावे। 
मैं' जब 'हम' हो जावे, 
'आप' जब 'तुम' हो जावे। 
भाव और विचारों में, 
अपना-पन झलकावे। 
मैं' जब 'हम' हो जावे, 
'आप' जब 'तुम' हो जावे।
घिरे मनो के फेरो से, 
अकेलापन मिट जावे। 
मैं' जब 'हम' हो जावे, 
'आप' जब 'तुम' हो जावे।
बिगड़े संबंध, टूटे-नाते, 
फिर इक हो जावे।  
मैं' जब 'हम' हो जावे, 
'आप' जब 'तुम' हो जावे।
क्षमा, दया, करुणा, प्रेम, 
जन्म यहि से पावे। 
मैं' जब 'हम' हो जावे, 
'आप' जब 'तुम' हो जावे।
जमी धूल की परतों से, 
अवगुण धूल जावे। 
मैं' जब 'हम' हो जावे, 
'आप' जब 'तुम' हो जावे।
दम्भ दूर हो जावे, 
अपूर्ण पूर्ण हो जावे। 
मैं' जब 'हम' हो जावे, 
'आप' जब 'तुम' हो जावे।

-आशुतोष सिंह चौहान 




Tuesday, 11 October 2022

🚩मर्यादित राम🚩

राम, 
सिया - राम, सिया - राम 
जय - जय राम! 
जन्म अयोध्या में पाकर,
रघु कुल के वंश वृक्ष बने ! 
माँ कौशल्या धन्य हुई,
दशरथ के तुम अंश बने! 
भरत लक्ष्मण शत्रुघ्न से, 
तीन प्रतापी भाई मिले! 
गुरु वशिष्ठ का ज्ञान मिले, 
प्रेम रूप सीता को पाया! 
राज तिलक के समारोह में, 
माँ कैकयी का अभिशाप मिला! 
पितृ आज्ञा के पालन में, 
14 वर्ष का वनवास मिला! 
अहिल्या को स्पर्श मात्र से, 
अभिशाप बंधन से मुक्त किया! 
सबरी की सेवा - पाकर, 
मन भावों को पूर्ण किया! 
सूर्पनखा के हठ की खातिर, 
सीता का अपहरण हुआ! 
सीता की खोज में, 
सुग्रीव, विभीषण जैसा मित्र मिला! 
हनुमान जैसा भक्त मिला, 
रावन का तारण करके! 
जन मानस को तृप्त किया, 
लव-कुश जैसे अंश मिले! 
इन सब गुणों को पाकर, 
फिर मर्यादित राम बने! 

राम, 
सिया - राम, सिया - राम
जय - जय राम! 

-आशुतोष सिंह चौहान 

Tuesday, 11 May 2021

मेला

मेला आया मेला आया, 
बच्चे फिरते फूले-फूले।
मेले में वो जाएंगे ,
चाट पकौड़ी खाएंगे।
खेल-खिलौने लाएंगे, 
दृश्य कई मेले में देखे ।
सर्कस देखा तम्बू वाले,
झूला-झूले चकरी वाले।
कई मिले जाने अनजाने,
अपना-पन बढ़ता मेले से।
प्रेम का रंग चढ़ता मेले में,
मेला जब भी आता है ।
मन को खूब लुभाता है, 
मेला आया मेला आया।

-आशुतोष सिंह चौहान 

Monday, 26 April 2021

माँ

रोते - रोते जो हँसा दे,
उसका नाम है माँ।
चिंता में भी हो मस्ती करा दे, 
उसका नाम है माँ।
जब हर कोई हमे गलत समझे, 
उस वक़्त जो साथ निभाये वो है माँ।
चाहे हजार बहाने बना लो पर, 
उन बहानो के बाद भी जो खाना खिलाए वो है माँ।
हर सुख - दुःख में जो साथ रहती हैं, 
उस रिश्ते का नाम है माँ।
जब वक़्त थम जाये, दूर जाने का डर सताये,
इसी प्यारे रिश्ते का नाम है माँ। ❣️💕❣️

-तृप्ति सिंह (सिया) 

PC- Ashutosh Singh Chauhan