Sunday, 3 August 2025

मृत्तिका - संयोग

प्रिय सखा! तुम एक दिवस, 

लेना मृत्तिका — कोमल, नर्म,

तरल कल्पना में गूंथ उसे,

गढ़ना दो प्रतिमा-अविकर्म।

एक प्रतीक तुम-सा, सरल,
दूजा प्रतिबिंब मेरा निर्मल,
निर्झर-प्रवाह से तरल दृष्टि,
अंकित कर देना नयन-काजल।

बिना प्राण के वह स्वर मूर्त,
किन्तु हृदय के निकट प्रतीत,
हों दोनों में चेतन कंपन,
युग चेतना का वह हो गीत।

फिर - 
चुपचाप उन्हें तुम तोड़ देना,
बिना वेदना, बिना अश्रु लेना,
जैसे विधि की रचना क्षर है,
वैसे ही बंधन मुक्त कर देना।

उस मृत्तिका को फिर से रच,
दो प्रतिमा नव जीवन-दृक,
एक तुम्हारा-सा, किंचित मेरा,
एक मेरा-सा, किंचित तव।

अब न वे होंगे पूर्ण स्वयम में,
किन्तु संपूर्ण बनेंगे संग में,
मैं तुममें बिखरूँ रज-कण सम,
तुम मुझमें घुलो, जल-तरंग में।

तेरे हृदय में मेरा संताप,
मेरे मन में तेरी उजास,
वह जो बनें अब, हों अद्वैत,
ना द्वय, ना एक, बस परिभाष

यह संयोजन —
ना केवल सौंदर्य की चाह,
ना केवल मिट्टी की गंध,
बल्कि आत्मा की साझ,
और चेतना की अभ्यर्थना। 

यही है सखा! 
विरह में अनुराग, समर्पण में स्वर,
जहाँ मिट्टी सिखाए मिलन का रहस्य,
जहाँ तुम मुझमें, मैं तुममें-
कुछ तुम जैसे, कुछ मुझ जैसे... 

Sunday, 30 March 2025

शक्ति स्वरूपा माँ नव-दुर्गा


प्रथम शैलपुत्री भवानी, स्नेह सुधा रस बरसाए।
धैर्य, शांति की दानी माता, भक्त विपद-हर जाए॥

ब्रह्मचारिणी तेज अनोखा, ज्ञान से जीवन महके।
तप से तप्त हृदय में माता, शीतलता बरसा रखे॥

चंद्रघंटा रण में कूदी, सिंह सवार विकराल बनी।
जो भी शत्रु बढ़ा सामने, रक्त धार से भूमि धनी॥

कूष्मांडा माँ सृष्टि विधाता, तेज से नभ को भरती।
सूर्य प्रभा सम रूप इनका, जो भी देखे, सुधरती॥

ममता की छवि संग विराजीं, स्कंदमाता दुलार करें।
भक्त पुकारे, माँ को ध्यावे, झोली सुख से तार भरें॥

कात्यायनी रण की देवी, शक्ति का संचार करें।
महिषासुर का मान हराकर, जग में नव आभार भरें॥

कालरात्रि क्रोध की ज्वाला, देख सुरासुर कांपे।
भक्त चरण में शीश झुकाकर, चरण-कमल पर लिपटे॥

महागौरी शांति स्वरूपा, रूप उजास अपार भरे।
जो भी प्रेम सुमन चढ़ावे, माँ के नयनों में नीर झरे॥

सिद्धिदात्री पूर्ण करुणा, नव निधि का संचार करें।
जो भी भक्त नमन कर लाए, भाग्य सुधा रस धार भरें॥

नव रूपों की ज्योति चमकती, पर्व नवरात्रि पावन हो।
डोले मृदंग, बजे घड़ियाली, माता की गूँजे वंदन हो॥

जय दुर्गे, जय माँ भवानी, शक्ति रूपिणी संकट हरो।
भक्ति सहित शीश नवाते, कृपा करुणा रस मन धरो॥

                               🙏🚩🙏

-आशुतोष सिंह 

Tuesday, 18 March 2025

प्रेमाभा:- भाव - मंजरी

यह पद्य आठ भागों में क्रमशः है - जो इसी पद्य का भाग है, इसलिए सभी का एक साथ पाठन करे। 

   1. श्रद्धा 
भाव तरंगित मन के भीतर,
मौन पलों में गूँज उठी, 
प्रिय स्मृतियों की मधुर सुरभि,
जैसे धरा पे मेघ झुकी।

नयनों में कुछ सपने जागे, 
हृदय हुआ बेसुध, अधीर, 
शब्द विहग बन उड़ते मन में, 
प्रेम लहर का मधुर नीर ।

        2. आशा
शीतल समीर सहलाने लगी,
कम्पित पत्तों की हरियाली, 
नभ से झरते चांद उजाले, 
बनते मन की मधुर लाली।

पलकों पर थी कोमल आशा, 
सांसों में अनकहा गीत,
मन के मंदिर में दीपक-सा, 
प्रेम जलाकर हुआ पुनीत। 

        3. स्मृति 
हृदय गगन में स्वप्न सजे थे,
चुपके से कुछ कहती रात, 
तारों की वह मौन झिलमिल, 
जागे मन में मधुर बात। 

बाँसुरी की धुन में खोकर, 
थम गए सब व्याकुल भाव, 
प्रेम की उस मधुर गली में, 
बस गया अनजाना चाव। 

        4. विरह 
चन्द्र किरण भी थककर सोई, 
सागर लहरे मौन हुई, 
मन की गहराई में फिर से, 
प्रेम कथा अनुपम बही। 

नभ से झरतें सपनों के रंग, 
धरती ने भी अंग लगाए, 
प्रेम पथिक बन, मैं अकेला, 
तेरी राहों में खोता जाऊ।
        5. वेदना 
मौन निशा की छाव में बैठा, 
चंचल मन कुछ कहने को, 
स्वरहीन गीतों में डूबा, 
तेरे रूप को गढ़ने को। 

तरु की छाया शांत खड़ी थी, 
शशि की किरणें गुप्त रही, 
सांसे तक धीमी हो आई,
पलकों में स्मृतियां बही। 

        6. समर्पण
प्रणय सुधा का कण - कण लेकर, 
मन पथिक नित भटक रहा, 
तेरी छवि के रश्मि पथ पर,
प्रेम दीप फिर जगमग रहा। 

हर धड़कन में गूँज रही है, 
संग तेरे वो प्रिय पुकार, 
काल भी झुककर नमन करे, 
प्रेम बने अमर अपार। 

        7. आनंद 
नभ में तारक दीप जले,
मन में उजियारा सा छाया, 
तेरे चरणों में लिपटा प्रेम, 
ज्यों पवन केश ने सहलाया। 

श्वास स्वप्न हो, प्राण समर्पण, 
तेरा प्रेम बस प्राण बने, 
इस जीवन की हर गहराई, 
तेरे चरणों की धूल तले। 

        8. अमरत्व 
अब न कुछ कहना, न सुनना,
केवल तेरा ध्यान रहे, 
तेरे प्रेम में खोकर प्रिय, 
बस तेरा ही नाम रहे। 

काल मिटे, सृष्टि सिमटे, 
प्रेम धरा पर गूँज उठे,
तेरे संग यह जीवन मेरा,
अमर प्रेम बन झूम उठे।

आशुतोष सिंह
18.03.2025

Thursday, 13 March 2025

प्रेम - पर्व :- होली

होलिका की ज्योति में, मिटे मनों के भार,

जलें विकार-अहं सभी, शुभ हो नए विचार।

रंग बरसे आसमाँ से, प्रीत भरे पैगाम,

हँसी-मजाक की बौछारें, छू लें हर इक धाम॥


अंग-अंग रंगीन हो, थिरके मन बेध्यान,

स्नेह सुधा की धार में, बहें पुराने मान।

फागुन की इस मस्ती में, घुली मिठास अपार,

गले मिले हर हृदय 4444 4444 r4 4|t4, नेह बने आधार॥

आओ रंगों में घुले, स्नेह-सुरभि के भाव,

प्रेम पिएं इस होली

पर, मिटे सभी दुराव।

नव उमंग, नव गीत हों, छूटे मन के बंध,

रंगों संग66 उड़ जाएं सब, कलुष, द्वेष और क्रंद॥

Thursday, 2 January 2025

प्यारी - नानी

नानी की ममता है अनमोल,
प्यार भरा जैसे मधुर रस घोल।
उनकी गोद में सुख का घर,
दूर हो जीवन के सारे डर।
कहानी सुनाएँ वो चाँद-सितारों की,
सिखाएँ हमें बातें जीवन के तारों की।
हर सुबह की पूजा, हर रात का गीत,
उनके संग बचपन हुआ मनमीत।
रसोई में गूँजे उनकी हँसी,
हर निवाले में सजी प्रेम की मिष्ठि।
उनके हाथों का स्वाद अनोखा,
स्नेह से महका हर कोना।
उनकी यादें दिल में बसतीं,
जैसे खुशबू फूलों से रसती।
नानी, तुम हो जीवन का दर्पण,
तुमसे सीखा सच्चा अनुकरण।