प्रिय सखा! तुम एक दिवस,
लेना मृत्तिका — कोमल, नर्म,
तरल कल्पना में गूंथ उसे,
गढ़ना दो प्रतिमा-अविकर्म।
एक प्रतीक तुम-सा, सरल,
दूजा प्रतिबिंब मेरा निर्मल,
निर्झर-प्रवाह से तरल दृष्टि,
अंकित कर देना नयन-काजल।
बिना प्राण के वह स्वर मूर्त,
किन्तु हृदय के निकट प्रतीत,
हों दोनों में चेतन कंपन,
युग चेतना का वह हो गीत।
फिर -
चुपचाप उन्हें तुम तोड़ देना,
बिना वेदना, बिना अश्रु लेना,
जैसे विधि की रचना क्षर है,
वैसे ही बंधन मुक्त कर देना।
उस मृत्तिका को फिर से रच,
दो प्रतिमा नव जीवन-दृक,
एक तुम्हारा-सा, किंचित मेरा,
एक मेरा-सा, किंचित तव।
अब न वे होंगे पूर्ण स्वयम में,
किन्तु संपूर्ण बनेंगे संग में,
मैं तुममें बिखरूँ रज-कण सम,
तुम मुझमें घुलो, जल-तरंग में।
तेरे हृदय में मेरा संताप,
मेरे मन में तेरी उजास,
वह जो बनें अब, हों अद्वैत,
ना द्वय, ना एक, बस परिभाष।
यह संयोजन —
ना केवल सौंदर्य की चाह,
ना केवल मिट्टी की गंध,
बल्कि आत्मा की साझ,
और चेतना की अभ्यर्थना।
यही है सखा!
विरह में अनुराग, समर्पण में स्वर,
जहाँ मिट्टी सिखाए मिलन का रहस्य,
जहाँ तुम मुझमें, मैं तुममें-
कुछ तुम जैसे, कुछ मुझ जैसे...