Sunday, 3 August 2025

मृत्तिका - संयोग

प्रिय सखा! तुम एक दिवस, 

लेना मृत्तिका — कोमल, नर्म,

तरल कल्पना में गूंथ उसे,

गढ़ना दो प्रतिमा-अविकर्म।

एक प्रतीक तुम-सा, सरल,
दूजा प्रतिबिंब मेरा निर्मल,
निर्झर-प्रवाह से तरल दृष्टि,
अंकित कर देना नयन-काजल।

बिना प्राण के वह स्वर मूर्त,
किन्तु हृदय के निकट प्रतीत,
हों दोनों में चेतन कंपन,
युग चेतना का वह हो गीत।

फिर - 
चुपचाप उन्हें तुम तोड़ देना,
बिना वेदना, बिना अश्रु लेना,
जैसे विधि की रचना क्षर है,
वैसे ही बंधन मुक्त कर देना।

उस मृत्तिका को फिर से रच,
दो प्रतिमा नव जीवन-दृक,
एक तुम्हारा-सा, किंचित मेरा,
एक मेरा-सा, किंचित तव।

अब न वे होंगे पूर्ण स्वयम में,
किन्तु संपूर्ण बनेंगे संग में,
मैं तुममें बिखरूँ रज-कण सम,
तुम मुझमें घुलो, जल-तरंग में।

तेरे हृदय में मेरा संताप,
मेरे मन में तेरी उजास,
वह जो बनें अब, हों अद्वैत,
ना द्वय, ना एक, बस परिभाष

यह संयोजन —
ना केवल सौंदर्य की चाह,
ना केवल मिट्टी की गंध,
बल्कि आत्मा की साझ,
और चेतना की अभ्यर्थना। 

यही है सखा! 
विरह में अनुराग, समर्पण में स्वर,
जहाँ मिट्टी सिखाए मिलन का रहस्य,
जहाँ तुम मुझमें, मैं तुममें-
कुछ तुम जैसे, कुछ मुझ जैसे... 

Sunday, 30 March 2025

शक्ति स्वरूपा माँ नव-दुर्गा


प्रथम शैलपुत्री भवानी, स्नेह सुधा रस बरसाए।
धैर्य, शांति की दानी माता, भक्त विपद-हर जाए॥

ब्रह्मचारिणी तेज अनोखा, ज्ञान से जीवन महके।
तप से तप्त हृदय में माता, शीतलता बरसा रखे॥

चंद्रघंटा रण में कूदी, सिंह सवार विकराल बनी।
जो भी शत्रु बढ़ा सामने, रक्त धार से भूमि धनी॥

कूष्मांडा माँ सृष्टि विधाता, तेज से नभ को भरती।
सूर्य प्रभा सम रूप इनका, जो भी देखे, सुधरती॥

ममता की छवि संग विराजीं, स्कंदमाता दुलार करें।
भक्त पुकारे, माँ को ध्यावे, झोली सुख से तार भरें॥

कात्यायनी रण की देवी, शक्ति का संचार करें।
महिषासुर का मान हराकर, जग में नव आभार भरें॥

कालरात्रि क्रोध की ज्वाला, देख सुरासुर कांपे।
भक्त चरण में शीश झुकाकर, चरण-कमल पर लिपटे॥

महागौरी शांति स्वरूपा, रूप उजास अपार भरे।
जो भी प्रेम सुमन चढ़ावे, माँ के नयनों में नीर झरे॥

सिद्धिदात्री पूर्ण करुणा, नव निधि का संचार करें।
जो भी भक्त नमन कर लाए, भाग्य सुधा रस धार भरें॥

नव रूपों की ज्योति चमकती, पर्व नवरात्रि पावन हो।
डोले मृदंग, बजे घड़ियाली, माता की गूँजे वंदन हो॥

जय दुर्गे, जय माँ भवानी, शक्ति रूपिणी संकट हरो।
भक्ति सहित शीश नवाते, कृपा करुणा रस मन धरो॥

                               🙏🚩🙏

-आशुतोष सिंह 

Tuesday, 18 March 2025

प्रेमाभा:- भाव - मंजरी

यह पद्य आठ भागों में क्रमशः है - जो इसी पद्य का भाग है, इसलिए सभी का एक साथ पाठन करे। 

   1. श्रद्धा 
भाव तरंगित मन के भीतर,
मौन पलों में गूँज उठी, 
प्रिय स्मृतियों की मधुर सुरभि,
जैसे धरा पे मेघ झुकी।

नयनों में कुछ सपने जागे, 
हृदय हुआ बेसुध, अधीर, 
शब्द विहग बन उड़ते मन में, 
प्रेम लहर का मधुर नीर ।

        2. आशा
शीतल समीर सहलाने लगी,
कम्पित पत्तों की हरियाली, 
नभ से झरते चांद उजाले, 
बनते मन की मधुर लाली।

पलकों पर थी कोमल आशा, 
सांसों में अनकहा गीत,
मन के मंदिर में दीपक-सा, 
प्रेम जलाकर हुआ पुनीत। 

        3. स्मृति 
हृदय गगन में स्वप्न सजे थे,
चुपके से कुछ कहती रात, 
तारों की वह मौन झिलमिल, 
जागे मन में मधुर बात। 

बाँसुरी की धुन में खोकर, 
थम गए सब व्याकुल भाव, 
प्रेम की उस मधुर गली में, 
बस गया अनजाना चाव। 

        4. विरह 
चन्द्र किरण भी थककर सोई, 
सागर लहरे मौन हुई, 
मन की गहराई में फिर से, 
प्रेम कथा अनुपम बही। 

नभ से झरतें सपनों के रंग, 
धरती ने भी अंग लगाए, 
प्रेम पथिक बन, मैं अकेला, 
तेरी राहों में खोता जाऊ।
        5. वेदना 
मौन निशा की छाव में बैठा, 
चंचल मन कुछ कहने को, 
स्वरहीन गीतों में डूबा, 
तेरे रूप को गढ़ने को। 

तरु की छाया शांत खड़ी थी, 
शशि की किरणें गुप्त रही, 
सांसे तक धीमी हो आई,
पलकों में स्मृतियां बही। 

        6. समर्पण
प्रणय सुधा का कण - कण लेकर, 
मन पथिक नित भटक रहा, 
तेरी छवि के रश्मि पथ पर,
प्रेम दीप फिर जगमग रहा। 

हर धड़कन में गूँज रही है, 
संग तेरे वो प्रिय पुकार, 
काल भी झुककर नमन करे, 
प्रेम बने अमर अपार। 

        7. आनंद 
नभ में तारक दीप जले,
मन में उजियारा सा छाया, 
तेरे चरणों में लिपटा प्रेम, 
ज्यों पवन केश ने सहलाया। 

श्वास स्वप्न हो, प्राण समर्पण, 
तेरा प्रेम बस प्राण बने, 
इस जीवन की हर गहराई, 
तेरे चरणों की धूल तले। 

        8. अमरत्व 
अब न कुछ कहना, न सुनना,
केवल तेरा ध्यान रहे, 
तेरे प्रेम में खोकर प्रिय, 
बस तेरा ही नाम रहे। 

काल मिटे, सृष्टि सिमटे, 
प्रेम धरा पर गूँज उठे,
तेरे संग यह जीवन मेरा,
अमर प्रेम बन झूम उठे।

आशुतोष सिंह
18.03.2025

Thursday, 13 March 2025

प्रेम - पर्व :- होली

होलिका की ज्योति में, मिटे मनों के भार,

जलें विकार-अहं सभी, शुभ हो नए विचार।

रंग बरसे आसमाँ से, प्रीत भरे पैगाम,

हँसी-मजाक की बौछारें, छू लें हर इक धाम॥


अंग-अंग रंगीन हो, थिरके मन बेध्यान,

स्नेह सुधा की धार में, बहें पुराने मान।

फागुन की इस मस्ती में, घुली मिठास अपार,

गले मिले हर हृदय 4444 4444 r4 4|t4, नेह बने आधार॥

आओ रंगों में घुले, स्नेह-सुरभि के भाव,

प्रेम पिएं इस होली

पर, मिटे सभी दुराव।

नव उमंग, नव गीत हों, छूटे मन के बंध,

रंगों संग66 उड़ जाएं सब, कलुष, द्वेष और क्रंद॥

Thursday, 2 January 2025

प्यारी - नानी

नानी की ममता है अनमोल,
प्यार भरा जैसे मधुर रस घोल।
उनकी गोद में सुख का घर,
दूर हो जीवन के सारे डर।
कहानी सुनाएँ वो चाँद-सितारों की,
सिखाएँ हमें बातें जीवन के तारों की।
हर सुबह की पूजा, हर रात का गीत,
उनके संग बचपन हुआ मनमीत।
रसोई में गूँजे उनकी हँसी,
हर निवाले में सजी प्रेम की मिष्ठि।
उनके हाथों का स्वाद अनोखा,
स्नेह से महका हर कोना।
उनकी यादें दिल में बसतीं,
जैसे खुशबू फूलों से रसती।
नानी, तुम हो जीवन का दर्पण,
तुमसे सीखा सच्चा अनुकरण।

Thursday, 23 May 2024

लड़की एक स्यानी : अनकही सी कहानी

बन्द कमरा सहमी आवाज
वो अंधेरी काली रात 
चुपके से एक इन्सान आया 
हाथ उसने ओर बढ़ाया 
डरी सहमी नींद से जागी
उठ खड़ी हो दूर वो भागी 
नाकाम रही वो, पकड़ा था कसकर
एक हाथ पंहुचा सीने पर 
दूजे से साध मुँह को दबाया 
कान में फुस - फुसाकर
डर का माया जाल बनाया 
आवाज कुछ पहचानी थी 
वह थी उसके अपनों की
सहमी सिसकी पूरी रात 
दर्द में तड़पी पूरी रात
लोग कहेंगे क्या? डर से 
कभी नहीं कह पाती 
लड़की एक स्यानी
अनकही - सी कहानी 
किस्सा कैसे बताती 
याद करके सहम जाती 
दिखाती सीने के घाव कैसे? 
तो इज्जत उसी की उछल जाती 
सुनाओ कहानी सबकों ये 
लड़की को सामान नहीं 
सम्मान समझना 
लोग कहेंगे क्या? डर से 
मत सहना जिस्म पर 
हाथ किसी का।
बन्द कमरा सहमी आवाज 
वो अँधेरी काली रात 

Tuesday, 7 May 2024

गिरगिट


मानव समाज का केंद्र बिन्दु है तो उसकी बातचीत उसे समाज में बने रहने का साधन है। मानव की बातचीत का माध्यम ही तय करता है कि वह केंद्र में होगा या नहीं। बातचीत के भी दो माध्यम होते हैं, जिससे दो विचारधाराओं का जन्म होता है - स्पष्टवादी 
                                             चाटुकार या चापलूस 

पहली विचारधारा उन मानवों कि है जो आज के समाज में विलुप्तता कि कगार पर हैं। ये ये लोग हैं जिनकी बातचीत स्पष्टवादिता का आँचल पकड़े हुए रहती है। जो आज के समाज और उनके लोगों को तीखी, नुकीली और कटुतापूर्ण लगती है। परंतु सत्य तो यह है कि इनकी बात में तथ्यों कि सत्यतता होती है. जो गिरगिट की तरह रंग बदलाव नहीं करती है यह अपने ही संत्य और स्पष्टवादिता के रंग में रंगी रहती है। बातचीत का झुकाव व्यक्तिपरक या स्थितिपरक न होकर तथ्यपरक होता है। ऐसे लोग आज के समाज और उनके लोगों को फूटी आँख भी नहीं सोहते हैं। आज के समाज ने ऐसे लोगों को मुँहफट की संजा दी है।

दूसरी विचारधारा, पहली विचारधारा के पूर्णतः विपरीत हैं। यह उन मानव की जाति है, जिनका स्पष्टवादिता और सत्यता से कोसो दूर का नाता नहीं है। इनकी बातचीत का झुकाव व्यक्तिपरक और समाजपरक होता है। यह समाज की स्थिति और लोगों की प्रस्थिति के अनुरुप गिरगिट की तरह अपने बातचीत का सुर बदल लेते हैं। ऐसे लोग अपना स्वार्थ साधना ही परम लक्ष्य मानते हैं।

आज के समाज में ऐसे ही लोगों का बहुमत है, और इन्हें चापलूस या चाटुकार की संज्ञा दी गयी है और इस कार्य को चाटुकारिता।

आज के समाज में पहली विचारधारा के लोग भूसे में सुई ढूँढने जैसे हो गए है। कमी केवल इस बात की नहीं की लोग स्पष्टवादी विचारधारा के नहीं, कमी इस बात की है की आज का समाज ऐसे लोगों को तवज्जो न देकर उन्हें कुंठापूर्ण हीन भावना से देखती है। आज के समाज चाटुकारिता के नशे में मदहोश है जिसका परिणाम यह हैं की चापलूसों या चाटुकारों का बगीचा फल-फूल रहा है।

ये (चापलूस या चाटुकार) लोग समाज और उसकी व्यवस्था के लिए उस मीठे जहर की तरह है जो धीरे धीरे जीवन को समाप्त कर देता है और यह लोग संबंध, समाज और उसकी व्यवस्था को समाप्त कर देते हैं।

Tuesday, 7 March 2023

आस्था (faith)


विश्वास भरे मन अधरों से, 
नारायण - भक्त पुकार किए ।

धर नरसिंह रूप रचयों, 
प्रकट भय खंड खम्भों से ।


देख नारायण रूप विकराल। 
मची सभा में हाहाकार, 

राज भवन की चौखट पर, 
रख जंघन पर चीर दिए ।


हिरण्यकश्यप - संहार किए
अहम् सब चकनाचूर हूए। 


- आशुतोष सिंह "चौहान" 

Monday, 31 October 2022

'मैं' जब 'हम' हो जावे ; 'आप' जब 'तुम' हो जावे।

'मैं' जब 'हम' हो जावे, 
'आप' जब 'तुम' हो जावे।
कोरी शून्य कल्पना का, 
चक्र टूट फिर जावे। 
मैं' जब 'हम' हो जावे, 
'आप' जब 'तुम' हो जावे।
मन शान्ति हो जावे, 
काया रंग फिर पावे। 
मैं' जब 'हम' हो जावे, 
'आप' जब 'तुम' हो जावे। 
भाव और विचारों में, 
अपना-पन झलकावे। 
मैं' जब 'हम' हो जावे, 
'आप' जब 'तुम' हो जावे।
घिरे मनो के फेरो से, 
अकेलापन मिट जावे। 
मैं' जब 'हम' हो जावे, 
'आप' जब 'तुम' हो जावे।
बिगड़े संबंध, टूटे-नाते, 
फिर इक हो जावे।  
मैं' जब 'हम' हो जावे, 
'आप' जब 'तुम' हो जावे।
क्षमा, दया, करुणा, प्रेम, 
जन्म यहि से पावे। 
मैं' जब 'हम' हो जावे, 
'आप' जब 'तुम' हो जावे।
जमी धूल की परतों से, 
अवगुण धूल जावे। 
मैं' जब 'हम' हो जावे, 
'आप' जब 'तुम' हो जावे।
दम्भ दूर हो जावे, 
अपूर्ण पूर्ण हो जावे। 
मैं' जब 'हम' हो जावे, 
'आप' जब 'तुम' हो जावे।

-आशुतोष सिंह चौहान 




Tuesday, 11 October 2022

🚩मर्यादित राम🚩

राम, 
सिया - राम, सिया - राम 
जय - जय राम! 
जन्म अयोध्या में पाकर,
रघु कुल के वंश वृक्ष बने ! 
माँ कौशल्या धन्य हुई,
दशरथ के तुम अंश बने! 
भरत लक्ष्मण शत्रुघ्न से, 
तीन प्रतापी भाई मिले! 
गुरु वशिष्ठ का ज्ञान मिले, 
प्रेम रूप सीता को पाया! 
राज तिलक के समारोह में, 
माँ कैकयी का अभिशाप मिला! 
पितृ आज्ञा के पालन में, 
14 वर्ष का वनवास मिला! 
अहिल्या को स्पर्श मात्र से, 
अभिशाप बंधन से मुक्त किया! 
सबरी की सेवा - पाकर, 
मन भावों को पूर्ण किया! 
सूर्पनखा के हठ की खातिर, 
सीता का अपहरण हुआ! 
सीता की खोज में, 
सुग्रीव, विभीषण जैसा मित्र मिला! 
हनुमान जैसा भक्त मिला, 
रावन का तारण करके! 
जन मानस को तृप्त किया, 
लव-कुश जैसे अंश मिले! 
इन सब गुणों को पाकर, 
फिर मर्यादित राम बने! 

राम, 
सिया - राम, सिया - राम
जय - जय राम! 

-आशुतोष सिंह चौहान 

Tuesday, 11 May 2021

मेला

मेला आया मेला आया, 
बच्चे फिरते फूले-फूले।
मेले में वो जाएंगे ,
चाट पकौड़ी खाएंगे।
खेल-खिलौने लाएंगे, 
दृश्य कई मेले में देखे ।
सर्कस देखा तम्बू वाले,
झूला-झूले चकरी वाले।
कई मिले जाने अनजाने,
अपना-पन बढ़ता मेले से।
प्रेम का रंग चढ़ता मेले में,
मेला जब भी आता है ।
मन को खूब लुभाता है, 
मेला आया मेला आया।

-आशुतोष सिंह चौहान 

Monday, 26 April 2021

माँ

रोते - रोते जो हँसा दे,
उसका नाम है माँ।
चिंता में भी हो मस्ती करा दे, 
उसका नाम है माँ।
जब हर कोई हमे गलत समझे, 
उस वक़्त जो साथ निभाये वो है माँ।
चाहे हजार बहाने बना लो पर, 
उन बहानो के बाद भी जो खाना खिलाए वो है माँ।
हर सुख - दुःख में जो साथ रहती हैं, 
उस रिश्ते का नाम है माँ।
जब वक़्त थम जाये, दूर जाने का डर सताये,
इसी प्यारे रिश्ते का नाम है माँ। ❣️💕❣️

-तृप्ति सिंह (सिया) 

PC- Ashutosh Singh Chauhan 

Saturday, 25 July 2020

मेरी प्यारी बहना

खुशियो रूपी सागर में ही आपकी जीवन-कश्ती हो। 
सदा वही स्पर्श करे, जिस हवा में  बस्ती बसती  हो। 
जीवन की इस पुस्तक में बस, सुख से भरी कहानी हो। 
दिन आए बार - बार ये , जब तक  सागर में पानी हो। 
बहार हो तेरे आँगन में , दामन में बस प्यार हो। 
हृदय से जन्म-दिवस पर बारम्बार बधाई। 
इरादे नेक, विचार श्रेष्ठ हो , अमल आपकी बात हो। 
झीलों में ऐसा पुष्प हो कि हर पल मन हर्षाऐ। 
पूरी सदा हो ख्वाहिशें, सदा किस्मत  आपके साथ हो 
चमक सदा हो चेहरों पर , दूरी न हो रिश्तों में 
कर्म बुरे न हो जीवन में , हर पल सदा भलाई हो
हृदय से जन्म-दिवस पर बारम्बार बधाई।

-आशुतोष सिंह चौहान

Wednesday, 2 October 2019

पूछे बेटी पिता से, जन्म पर मेरे आँसूं बहाओगे तो नहीं।

पूछे बेटी पिता से,
                          जन्म पर मेरे आँसूं बहाओगे  तो नहीं।
जन्म पर  मेरे खुशियाँ मनाओगे,
                                             गम में डूब जाओगे तो नहीं।
मांगू जो प्यार आपका तो ,
                                     नफरत जताओगे तो नहीं।
चाहूँ मैं अगर पढ़ना तो,
                                   इंकार कर जाओगे तो नहीं।
चाहूँ मैं अधिकार बराबर का तो,
                                              भेदभाव जताओगे  तो नहीं।
जब हो गयी जवान तो,
                                  विवाह कर सूली चढ़ाओगे तो नहीं।
फूलों की तरह पाली इस बेटी को,
                                                 काँटों पे बिठाओगे तो नहीं।
कर पराया इस बेटी को,
                                 भूल जाओगे तो नहीं।
पूछे बेटी पिता से,
                          जन्म पर मेरे आँसूं  बहाओगे तो नहीं।




                                           - आशुतोष सिंह चौहान 

Thursday, 5 September 2019

अर्जुन के लक्ष्य विभेद में, द्रोण को पहचानिए।

अर्जुन के लक्ष्य विभेद में, द्रोण को पहचानिए। 

झरनो के जल झंकार में, 
मेरु शिल को जानिए। 
अर्जुन के लक्ष्य विभेद में, 
द्रोण को पहचानिए। 
नदियों की बहती एक अथक धार,  
चलती मधुर एक साज पर।  
सागर से होता मिलान कैसे, 
रहती नहीं जो ढाल पर। 
ग़र कोई आगे बढ़ा है ,
अपने कदमो में खड़ा है। 
होती है कोई ढाल  ही, 
जिसने उसे पहचान दी। 
उस नदी की धार पर,
उस ढल को  पहचानिए। 
अर्जुन के लक्ष्य विभेद में, 
द्रोण को पहचानिए। 
  ज्ञान के संचार की,
बिन गुरु नहीं परिकल्पना। 
औरों की तो बात क्या, 
भगवन ने भी गुरु चुना। 
कृष्ण में संदीपनी को,
वशिष्ठ को राम में जानिए। 
अर्जुन के लक्ष्य विभेद में, 
द्रोण को पहचानिए। 
झरनो के जल झंकार में, 
मेरु शिल को जानिए। 
अर्जुन के लक्ष्य विभेद में, 
द्रोण को पहचानिए।

                                  -  आशुतोष सिंह  



#कवि संदीप द्विवेदी 

Thursday, 25 July 2019

बोलो कहाँ तक टिक सकोगे ?, यदि राम सा संघर्ष हो।

बोलो कहाँ तक टिक सकोगे ?, यदि राम सा संघर्ष हो।

सह ली सारी यातना पर,
कर्तव्य सर्वोपरि रखा।
त्याग, शील, संकल्प को,
जिस तरह जीवित रखा।
बोलो कहा तक टिक सकोगे ?,
यदि राम सा संघर्ष हो।
कल मुकुट जिस पर साजना था,
अब उसे सब कुछ त्यागना था।
निर्णयों के द्वन्द से,
एक बालपन का सामना था।
वचन भी था थामना,
आदेश भी था मानना।
किस तरह सोचो स्वयं को,
धर्म पर तुम रख सकोगे।
बोलो कहा तक टिक सकोगे ?,
यदि राम सा संघर्ष हो।
प्रजा तो बस राम की थी.
दुनिया उसे तो जप रही थी।
वचन ही था तोड़ देता,
धर्म ही था छोड़ देता।
पर पीढ़ियां क्या सीख लेंगी ?,
राम को चिंता यही थी।
हो छिन रहा एक क्षण मन सब कुछ,
सोचो एक क्षण क्या करोगे ?
बोलो कहा तक टिक सकोगे ?,
यदि राम सा संघर्ष हो।
केवट ने जाने क्या किया था,
सौभाग्य जो उसको मिला था।
राम से ही तारने को,
राम से ही लड़ गया था।
कुल वंश उसके तर रहे थे,
सब राम अर्पण कर रहें थे।
जब सब कुछ हो बिखरा हुआ,
इतने सरल कब तक रहोगे।
बोलो कहा तक टिक सकोगे ?,
यदि राम सा संघर्ष हो।
हैं याद वो घटना तुम्हें,
जब राम थे वनवास में।
सिया थी हर ली गई,
था कौन उनके साथ ,में ?
कुटी सब सुनी पड़ी थी,
दो भाई और विपदा बड़ी थी।
बोलो ऐसे मोड़ पर,
तुम धैर्य कब तक रख सकोगे ?
बोलो कहा तक टिक सकोगे ?,
यदि राम सा संघर्ष हो।
वह तो स्वयं भगवान था,
पर कहा उसमें मन था।
किरदार भी ऐसा चुना,
जिसमे सिर्फ बलिदान था।
मर्यादा के प्राण थे,
रघुवंश के अभिमान थे।
श्रीराम के अध्याय से,
एक पृष्ठ हासिल कर सकोगे ?
बोलो कहा तक टिक सकोगे ?,
यदि राम सा संघर्ष हो।
व्यथा इतनी ही नहीं हैं,
कथा इतनी से नहीं हैं।
कुछ शब्द उनको पूर्ण कर दे,
राम वो गाथा नहीं है।
जब तपे संघर्ष में,
तब हुए उत्कर्ष वो।
क्या तुम भी ऐसी प्रेणना ,
पीढ़ियों के बन सकोगे।
बोलो कहा तक टिक सकोगे ?,
यदि राम सा संघर्ष हो।
सह ली सारी यातना पर,
कर्तव्य सर्वोपरि रखा।
त्याग, शील, संकल्प को,
जिस तरह जीवित रखा।
बोलो कहा तक टिक सकोगे ?,
यदि राम सा संघर्ष हो।




- आशुतोष सिंह


#kavisandeepdiwedi

Thursday, 30 May 2019

बेटी है सौगात ईश की , स्वर्ग इसी से धरती।

(एक अजन्मी बेटी का अपनी माँ से अपने जन्म को लेकर संवाद जिसमें बेटी अपनी परिवेदना को अभिव्यक्त करती हैं. )
...................................................................
मेरी आयुष्य की डोरी को, जननी मत यूँ न तोड़ो.
मैं भी जन्मू इस धरती पर , मुझे अपनों से जोड़ो.
आयुष्य पूर्व मुझे न मारो , मेरी तुमसे विनती.
सब कुछ भैया को दे देना , मत करना मेरी गिनती.
देख रही हूं ओझल आयुष्य, प्रचरित पैशाचिक तिमिर का.
हर निमिष जकड़े तदबीर में, मुझको रामकों का मुहासिरा.
मेरे आयुष्य की डोरी को , जननी मत यूं न तोड़ो.
मैं भी जन्मू इस धरती पर , मुझे अपनों से जोड़ो.
आयुष्य पूर्व मुझे न मारो , मेरी तुमसे विनती.
सब कुछ भैया को दे देना ,मत करना मेरी गिनती.
क्यों इतनी दयाशून्य हुई जननी ? क्या है मेरी  गलती.
हाय विधाता , कैसी दुनिया ? नारी , नारी को छलती.
समझ सको तो समझो जननी , मुझ बिन सूना आंगन.
मेरी आयुष्य की डोर को, जननी मत यूँ न तोड़ो.
मैं भी जन्मू इस धरती पर , मुझे अपनों से जोड़ो.
आयुष्य पूर्व मुझे न मारो , मेरी तुमसे विनती.
सब कुछ भैया को दे देना , मत करना मेरी गिनती.
याद आऊंगी जब तुमको , होगा दूभर आयुष्य.
मेरी वेदना सुनो हे जननी , बनो न तुम हत्यारी.
आयुष्य प्रदेय करो तुम जननी , धर्म यही है तेरा.
मृत्यु का भय मुझे सताता , हर निमिष मन घबराता.
मेरी आयुष्य की डोरी को, जननी मत यूँ न तोड़ो.
मैं भी जन्मू इस धरती पर , मुझे अपनों से जोड़ो.
आयुष्य पूर्व मुझे न मारो , मेरी तुमसे विनती.
सब कुछ भैया को दे देना , मत करना मेरी गिनती.
पलने दो तुम मुझे गर्भ में , मुझे न मारो जननी.
लक्ष्य जीव का आयुष्य है, क्यों मनमानी करती.
बेटी है सौगात ईश की , स्वर्ग इसी से धरती.
मेरी आयुष्य की डोरी को, जननी मत यूँ न तोड़ो.
मैं भी जन्मू इस धरती पर , मुझे अपनों से जोड़ो.
आयुष्य पूर्व मुझे मारो , मेरी तुमसे विनती.
सब कुछ भैया को दे देना , मत करना मेरी गिनती.
चाह नहीं हैं धन दौलत की, बस आयुष्य पाना.
इस आयुष्य का एक उद्देश्य मात्र हैं तेरा स्नेह पाना.
मेरी आयुष्य की डोरी को, जननी मत यूँ न तोड़ो.
मैं भी जन्मू इस धरती पर , मुझे अपनों से जोड़ो.
आयुष्य पूर्व मुझे न मारो , मेरी तुमसे विनती.
सब कुछ भैया को दे देना , मत करना मेरी गिनती.
      

Wednesday, 29 May 2019

👫 दोस्ती 👫

हमारी दोस्ती है हमको प्यारी,
दुनिया में सबसे अलग दोस्ती हमारी,
कोई यादव कोई वर्मा कोई ठाकुर कोई शर्मा,
कोई मिश्रा, कोई विश्वकर्मा, कोई खान,
सब एक साथ हो तो समझो परिवर्तन जारी,
किसी से बड़े भाई का किसी से छोटे भाई का,
किसी से बहन का किसी से भौजाई का,
किसी से भौजाई कम बहन का किसी से दोस्त कम जलन का, रिश्ता कायम हो जाता है,
दोस्त बिना ज़िन्दगी बेकार हो जाती है,
जैसे बिना माँ बालक हो जाता है,
तुम सब हो तो ज़माना हसीन-रंगीन है,
बिना पिए ही राते-रंगीन  है,
न जाने कितनी व्यस्त अब ज़िंदगी हो गयी,
तुम सबको पा कर अपनी औकात मोदी हो गयी.

मेरे प्यारे से कमीने दोस्तों को समर्पित👫😘😍😘

Friday, 29 March 2019

तोता जी - तोता जी

तोता जी - तोता जी। .....

तोता जी - तोता जी। .....
जंगल के हो वक्ता जी,

पक्षियों के प्रवक्ता जी। 
प्रकृति   के हो पूत जी ,
पक्षियों के राजपूत जी। 
तोता जी - तोता जी। ......
वाणी के वाचाल जी ,
हो सबके मन मोहिया जी। 
मिमक्री के हो पुतले जी,
आमों के हो रसिया जी।
तोता जी - तोता जी। .....

 मन मोहको का जाल है ,
यही इंसानियत खेल है। 
तोता जी - तोता जी। ....... 





                                                     - आशुतोष सिंह 

Monday, 30 July 2018

दुर्घटना से देर भली!

संसार में जन्म लेने के लिए माँ के गर्भ में 9 महीने रुक सकते है।
चलने के लिए 1.5 से 2 वर्ष,
स्कूल में प्रवेश के लिए 3 वर्ष,
मतदान के लिए 18 वर्ष,
नौकरी के लिए 22 वर्ष,
शादी के लिये 25 -30 वर्ष,
इस तरह अनेक मौकों के लिए हम इंतजार करते है।
लेकिन,,,,,,
गाड़ी ओवरटेक करते समय 30 सेकंड भी नही रुकना चाहते,,,,। यह जानते हुए भी की गाड़ी मात्र एक मशीन है।

बाद में एक्सीडेंट होने के बाद जिन्दा रहे तो एक्सीडेंट निपटाने के लिए कई घण्टे, हॉस्पिटल में कई दिन, महीने या साल निकाल देते है।
कुछ सेकंड की गड़बड़ी कितना भयंकर परिणाम ला सकती है। जाने वाले चले जाते है, पीछे वालो का क्या। इस पर विचार किया कभी, किया नही।

फिर हर बार की तरह,नियति को दोष ।।

इसलिये कृपया सही रफ्तार में सही दिशा में वाहन संभल कर चलायें स्वयं भी सुरक्षित पहुंचे और दूसरों को भी सुरक्षित रखें।
आपका अपना मासूम परिवार आपका घर पर इंतजार कर रहा है।