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Sunday, 27 August 2017

आखिरी काम

एक बूढ़ा बढ़ई अपने काम के प्रति निष्ठावान और सज्जन व्यक्ति था। उसकी बनाई वस्तु देखने लायक होती थी, वह ठेकेदार के साथ मिलकर ठेके पर वस्तुओं का निर्माण करता उसकी बनी वस्तुएं दिखने में सुंदर, शोभायमान और मजबूत होती। उसकी कलात्मक रुचि वस्तुओं पर झलकती थी उसके जैसा कोई दूसरा कामगार नहीं था। एक से बढ़कर एक नई कलात्मक रूप रेखा से परिपूर्ण वस्तुओं का निर्माण करता था। काम करते करते वह वृद्ध हो चला था। वह बीमार रहता था और उसे घर की चिंता लगी रहती थी। वह एक दिन अपने ठेकेदार से घर जाने की बात कही  तो  ठेकेदार ने उसे पैसे देकर एक सुसज्जित घर बनाने को कहा उसने कहा कि वह काम पूरा करके तुम जा सकते हो, बढ़ाई घर जाने को जानकर अपने काम को इतनी जल्दी और हडबडी में पूरा करने लगा कि उसकी यह रचना उसकी जिंदगी की सबसे बेकार कलात्मक क्रिया थी जैसे तैसे उसने काम को पूरा किया और काम पूरा करने के बाद वहां ठेकेदार के पास गया तो ठेकेदार ने उसे यह  नया घर रहने के लिए तोहफे में दिया। बढ़ाई  सोच कर परेशान था कि मैंने आज तक सभी के लिए कितने अच्छे सुंदर और शोभायमान कलाकृतियों का निर्माण किया अपने लिए बनाए गए घर को इतना बदसूरत निर्मित किया व्यक्ति का काम ही उसकी पहचान होती है व्यक्ति को प्रत्येक निष्ठा से करनी चाहिए,  क्योंकि पता नहीं कौन सा काम आखरी काम हो।

-आशुतोष सिंह