Wednesday, 2 October 2019

पूछे बेटी पिता से, जन्म पर मेरे आँसूं बहाओगे तो नहीं।

पूछे बेटी पिता से,
                          जन्म पर मेरे आँसूं बहाओगे  तो नहीं।
जन्म पर  मेरे खुशियाँ मनाओगे,
                                             गम में डूब जाओगे तो नहीं।
मांगू जो प्यार आपका तो ,
                                     नफरत जताओगे तो नहीं।
चाहूँ मैं अगर पढ़ना तो,
                                   इंकार कर जाओगे तो नहीं।
चाहूँ मैं अधिकार बराबर का तो,
                                              भेदभाव जताओगे  तो नहीं।
जब हो गयी जवान तो,
                                  विवाह कर सूली चढ़ाओगे तो नहीं।
फूलों की तरह पाली इस बेटी को,
                                                 काँटों पे बिठाओगे तो नहीं।
कर पराया इस बेटी को,
                                 भूल जाओगे तो नहीं।
पूछे बेटी पिता से,
                          जन्म पर मेरे आँसूं  बहाओगे तो नहीं।




                                           - आशुतोष सिंह चौहान 

Thursday, 5 September 2019

अर्जुन के लक्ष्य विभेद में, द्रोण को पहचानिए।

अर्जुन के लक्ष्य विभेद में, द्रोण को पहचानिए। 

झरनो के जल झंकार में, 
मेरु शिल को जानिए। 
अर्जुन के लक्ष्य विभेद में, 
द्रोण को पहचानिए। 
नदियों की बहती एक अथक धार,  
चलती मधुर एक साज पर।  
सागर से होता मिलान कैसे, 
रहती नहीं जो ढाल पर। 
ग़र कोई आगे बढ़ा है ,
अपने कदमो में खड़ा है। 
होती है कोई ढाल  ही, 
जिसने उसे पहचान दी। 
उस नदी की धार पर,
उस ढल को  पहचानिए। 
अर्जुन के लक्ष्य विभेद में, 
द्रोण को पहचानिए। 
  ज्ञान के संचार की,
बिन गुरु नहीं परिकल्पना। 
औरों की तो बात क्या, 
भगवन ने भी गुरु चुना। 
कृष्ण में संदीपनी को,
वशिष्ठ को राम में जानिए। 
अर्जुन के लक्ष्य विभेद में, 
द्रोण को पहचानिए। 
झरनो के जल झंकार में, 
मेरु शिल को जानिए। 
अर्जुन के लक्ष्य विभेद में, 
द्रोण को पहचानिए।

                                  -  आशुतोष सिंह  



#कवि संदीप द्विवेदी 

Thursday, 25 July 2019

बोलो कहाँ तक टिक सकोगे ?, यदि राम सा संघर्ष हो।

बोलो कहाँ तक टिक सकोगे ?, यदि राम सा संघर्ष हो।

सह ली सारी यातना पर,
कर्तव्य सर्वोपरि रखा।
त्याग, शील, संकल्प को,
जिस तरह जीवित रखा।
बोलो कहा तक टिक सकोगे ?,
यदि राम सा संघर्ष हो।
कल मुकुट जिस पर साजना था,
अब उसे सब कुछ त्यागना था।
निर्णयों के द्वन्द से,
एक बालपन का सामना था।
वचन भी था थामना,
आदेश भी था मानना।
किस तरह सोचो स्वयं को,
धर्म पर तुम रख सकोगे।
बोलो कहा तक टिक सकोगे ?,
यदि राम सा संघर्ष हो।
प्रजा तो बस राम की थी.
दुनिया उसे तो जप रही थी।
वचन ही था तोड़ देता,
धर्म ही था छोड़ देता।
पर पीढ़ियां क्या सीख लेंगी ?,
राम को चिंता यही थी।
हो छिन रहा एक क्षण मन सब कुछ,
सोचो एक क्षण क्या करोगे ?
बोलो कहा तक टिक सकोगे ?,
यदि राम सा संघर्ष हो।
केवट ने जाने क्या किया था,
सौभाग्य जो उसको मिला था।
राम से ही तारने को,
राम से ही लड़ गया था।
कुल वंश उसके तर रहे थे,
सब राम अर्पण कर रहें थे।
जब सब कुछ हो बिखरा हुआ,
इतने सरल कब तक रहोगे।
बोलो कहा तक टिक सकोगे ?,
यदि राम सा संघर्ष हो।
हैं याद वो घटना तुम्हें,
जब राम थे वनवास में।
सिया थी हर ली गई,
था कौन उनके साथ ,में ?
कुटी सब सुनी पड़ी थी,
दो भाई और विपदा बड़ी थी।
बोलो ऐसे मोड़ पर,
तुम धैर्य कब तक रख सकोगे ?
बोलो कहा तक टिक सकोगे ?,
यदि राम सा संघर्ष हो।
वह तो स्वयं भगवान था,
पर कहा उसमें मन था।
किरदार भी ऐसा चुना,
जिसमे सिर्फ बलिदान था।
मर्यादा के प्राण थे,
रघुवंश के अभिमान थे।
श्रीराम के अध्याय से,
एक पृष्ठ हासिल कर सकोगे ?
बोलो कहा तक टिक सकोगे ?,
यदि राम सा संघर्ष हो।
व्यथा इतनी ही नहीं हैं,
कथा इतनी से नहीं हैं।
कुछ शब्द उनको पूर्ण कर दे,
राम वो गाथा नहीं है।
जब तपे संघर्ष में,
तब हुए उत्कर्ष वो।
क्या तुम भी ऐसी प्रेणना ,
पीढ़ियों के बन सकोगे।
बोलो कहा तक टिक सकोगे ?,
यदि राम सा संघर्ष हो।
सह ली सारी यातना पर,
कर्तव्य सर्वोपरि रखा।
त्याग, शील, संकल्प को,
जिस तरह जीवित रखा।
बोलो कहा तक टिक सकोगे ?,
यदि राम सा संघर्ष हो।




- आशुतोष सिंह


#kavisandeepdiwedi

Thursday, 30 May 2019

बेटी है सौगात ईश की , स्वर्ग इसी से धरती।

(एक अजन्मी बेटी का अपनी माँ से अपने जन्म को लेकर संवाद जिसमें बेटी अपनी परिवेदना को अभिव्यक्त करती हैं. )
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मेरी आयुष्य की डोरी को, जननी मत यूँ न तोड़ो.
मैं भी जन्मू इस धरती पर , मुझे अपनों से जोड़ो.
आयुष्य पूर्व मुझे न मारो , मेरी तुमसे विनती.
सब कुछ भैया को दे देना , मत करना मेरी गिनती.
देख रही हूं ओझल आयुष्य, प्रचरित पैशाचिक तिमिर का.
हर निमिष जकड़े तदबीर में, मुझको रामकों का मुहासिरा.
मेरे आयुष्य की डोरी को , जननी मत यूं न तोड़ो.
मैं भी जन्मू इस धरती पर , मुझे अपनों से जोड़ो.
आयुष्य पूर्व मुझे न मारो , मेरी तुमसे विनती.
सब कुछ भैया को दे देना ,मत करना मेरी गिनती.
क्यों इतनी दयाशून्य हुई जननी ? क्या है मेरी  गलती.
हाय विधाता , कैसी दुनिया ? नारी , नारी को छलती.
समझ सको तो समझो जननी , मुझ बिन सूना आंगन.
मेरी आयुष्य की डोर को, जननी मत यूँ न तोड़ो.
मैं भी जन्मू इस धरती पर , मुझे अपनों से जोड़ो.
आयुष्य पूर्व मुझे न मारो , मेरी तुमसे विनती.
सब कुछ भैया को दे देना , मत करना मेरी गिनती.
याद आऊंगी जब तुमको , होगा दूभर आयुष्य.
मेरी वेदना सुनो हे जननी , बनो न तुम हत्यारी.
आयुष्य प्रदेय करो तुम जननी , धर्म यही है तेरा.
मृत्यु का भय मुझे सताता , हर निमिष मन घबराता.
मेरी आयुष्य की डोरी को, जननी मत यूँ न तोड़ो.
मैं भी जन्मू इस धरती पर , मुझे अपनों से जोड़ो.
आयुष्य पूर्व मुझे न मारो , मेरी तुमसे विनती.
सब कुछ भैया को दे देना , मत करना मेरी गिनती.
पलने दो तुम मुझे गर्भ में , मुझे न मारो जननी.
लक्ष्य जीव का आयुष्य है, क्यों मनमानी करती.
बेटी है सौगात ईश की , स्वर्ग इसी से धरती.
मेरी आयुष्य की डोरी को, जननी मत यूँ न तोड़ो.
मैं भी जन्मू इस धरती पर , मुझे अपनों से जोड़ो.
आयुष्य पूर्व मुझे मारो , मेरी तुमसे विनती.
सब कुछ भैया को दे देना , मत करना मेरी गिनती.
चाह नहीं हैं धन दौलत की, बस आयुष्य पाना.
इस आयुष्य का एक उद्देश्य मात्र हैं तेरा स्नेह पाना.
मेरी आयुष्य की डोरी को, जननी मत यूँ न तोड़ो.
मैं भी जन्मू इस धरती पर , मुझे अपनों से जोड़ो.
आयुष्य पूर्व मुझे न मारो , मेरी तुमसे विनती.
सब कुछ भैया को दे देना , मत करना मेरी गिनती.
      

Wednesday, 29 May 2019

👫 दोस्ती 👫

हमारी दोस्ती है हमको प्यारी,
दुनिया में सबसे अलग दोस्ती हमारी,
कोई यादव कोई वर्मा कोई ठाकुर कोई शर्मा,
कोई मिश्रा, कोई विश्वकर्मा, कोई खान,
सब एक साथ हो तो समझो परिवर्तन जारी,
किसी से बड़े भाई का किसी से छोटे भाई का,
किसी से बहन का किसी से भौजाई का,
किसी से भौजाई कम बहन का किसी से दोस्त कम जलन का, रिश्ता कायम हो जाता है,
दोस्त बिना ज़िन्दगी बेकार हो जाती है,
जैसे बिना माँ बालक हो जाता है,
तुम सब हो तो ज़माना हसीन-रंगीन है,
बिना पिए ही राते-रंगीन  है,
न जाने कितनी व्यस्त अब ज़िंदगी हो गयी,
तुम सबको पा कर अपनी औकात मोदी हो गयी.

मेरे प्यारे से कमीने दोस्तों को समर्पित👫😘😍😘

Friday, 29 March 2019

तोता जी - तोता जी

तोता जी - तोता जी। .....

तोता जी - तोता जी। .....
जंगल के हो वक्ता जी,

पक्षियों के प्रवक्ता जी। 
प्रकृति   के हो पूत जी ,
पक्षियों के राजपूत जी। 
तोता जी - तोता जी। ......
वाणी के वाचाल जी ,
हो सबके मन मोहिया जी। 
मिमक्री के हो पुतले जी,
आमों के हो रसिया जी।
तोता जी - तोता जी। .....

 मन मोहको का जाल है ,
यही इंसानियत खेल है। 
तोता जी - तोता जी। ....... 





                                                     - आशुतोष सिंह 

Monday, 30 July 2018

दुर्घटना से देर भली!

संसार में जन्म लेने के लिए माँ के गर्भ में 9 महीने रुक सकते है।
चलने के लिए 1.5 से 2 वर्ष,
स्कूल में प्रवेश के लिए 3 वर्ष,
मतदान के लिए 18 वर्ष,
नौकरी के लिए 22 वर्ष,
शादी के लिये 25 -30 वर्ष,
इस तरह अनेक मौकों के लिए हम इंतजार करते है।
लेकिन,,,,,,
गाड़ी ओवरटेक करते समय 30 सेकंड भी नही रुकना चाहते,,,,। यह जानते हुए भी की गाड़ी मात्र एक मशीन है।

बाद में एक्सीडेंट होने के बाद जिन्दा रहे तो एक्सीडेंट निपटाने के लिए कई घण्टे, हॉस्पिटल में कई दिन, महीने या साल निकाल देते है।
कुछ सेकंड की गड़बड़ी कितना भयंकर परिणाम ला सकती है। जाने वाले चले जाते है, पीछे वालो का क्या। इस पर विचार किया कभी, किया नही।

फिर हर बार की तरह,नियति को दोष ।।

इसलिये कृपया सही रफ्तार में सही दिशा में वाहन संभल कर चलायें स्वयं भी सुरक्षित पहुंचे और दूसरों को भी सुरक्षित रखें।
आपका अपना मासूम परिवार आपका घर पर इंतजार कर रहा है।