Thursday, 5 September 2019

अर्जुन के लक्ष्य विभेद में, द्रोण को पहचानिए।

अर्जुन के लक्ष्य विभेद में, द्रोण को पहचानिए। 

झरनो के जल झंकार में, 
मेरु शिल को जानिए। 
अर्जुन के लक्ष्य विभेद में, 
द्रोण को पहचानिए। 
नदियों की बहती एक अथक धार,  
चलती मधुर एक साज पर।  
सागर से होता मिलान कैसे, 
रहती नहीं जो ढाल पर। 
ग़र कोई आगे बढ़ा है ,
अपने कदमो में खड़ा है। 
होती है कोई ढाल  ही, 
जिसने उसे पहचान दी। 
उस नदी की धार पर,
उस ढल को  पहचानिए। 
अर्जुन के लक्ष्य विभेद में, 
द्रोण को पहचानिए। 
  ज्ञान के संचार की,
बिन गुरु नहीं परिकल्पना। 
औरों की तो बात क्या, 
भगवन ने भी गुरु चुना। 
कृष्ण में संदीपनी को,
वशिष्ठ को राम में जानिए। 
अर्जुन के लक्ष्य विभेद में, 
द्रोण को पहचानिए। 
झरनो के जल झंकार में, 
मेरु शिल को जानिए। 
अर्जुन के लक्ष्य विभेद में, 
द्रोण को पहचानिए।

                                  -  आशुतोष सिंह  



#कवि संदीप द्विवेदी 

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