मानव समाज का केंद्र बिन्दु है तो उसकी बातचीत उसे समाज में बने रहने का साधन है। मानव की बातचीत का माध्यम ही तय करता है कि वह केंद्र में होगा या नहीं। बातचीत के भी दो माध्यम होते हैं, जिससे दो विचारधाराओं का जन्म होता है - स्पष्टवादी
चाटुकार या चापलूस
पहली विचारधारा उन मानवों कि है जो आज के समाज में विलुप्तता कि कगार पर हैं। ये ये लोग हैं जिनकी बातचीत स्पष्टवादिता का आँचल पकड़े हुए रहती है। जो आज के समाज और उनके लोगों को तीखी, नुकीली और कटुतापूर्ण लगती है। परंतु सत्य तो यह है कि इनकी बात में तथ्यों कि सत्यतता होती है. जो गिरगिट की तरह रंग बदलाव नहीं करती है यह अपने ही संत्य और स्पष्टवादिता के रंग में रंगी रहती है। बातचीत का झुकाव व्यक्तिपरक या स्थितिपरक न होकर तथ्यपरक होता है। ऐसे लोग आज के समाज और उनके लोगों को फूटी आँख भी नहीं सोहते हैं। आज के समाज ने ऐसे लोगों को मुँहफट की संजा दी है।
दूसरी विचारधारा, पहली विचारधारा के पूर्णतः विपरीत हैं। यह उन मानव की जाति है, जिनका स्पष्टवादिता और सत्यता से कोसो दूर का नाता नहीं है। इनकी बातचीत का झुकाव व्यक्तिपरक और समाजपरक होता है। यह समाज की स्थिति और लोगों की प्रस्थिति के अनुरुप गिरगिट की तरह अपने बातचीत का सुर बदल लेते हैं। ऐसे लोग अपना स्वार्थ साधना ही परम लक्ष्य मानते हैं।
आज के समाज में ऐसे ही लोगों का बहुमत है, और इन्हें चापलूस या चाटुकार की संज्ञा दी गयी है और इस कार्य को चाटुकारिता।
आज के समाज में पहली विचारधारा के लोग भूसे में सुई ढूँढने जैसे हो गए है। कमी केवल इस बात की नहीं की लोग स्पष्टवादी विचारधारा के नहीं, कमी इस बात की है की आज का समाज ऐसे लोगों को तवज्जो न देकर उन्हें कुंठापूर्ण हीन भावना से देखती है। आज के समाज चाटुकारिता के नशे में मदहोश है जिसका परिणाम यह हैं की चापलूसों या चाटुकारों का बगीचा फल-फूल रहा है।
ये (चापलूस या चाटुकार) लोग समाज और उसकी व्यवस्था के लिए उस मीठे जहर की तरह है जो धीरे धीरे जीवन को समाप्त कर देता है और यह लोग संबंध, समाज और उसकी व्यवस्था को समाप्त कर देते हैं।
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