Monday, 31 October 2022

'मैं' जब 'हम' हो जावे ; 'आप' जब 'तुम' हो जावे।

'मैं' जब 'हम' हो जावे, 
'आप' जब 'तुम' हो जावे।
कोरी शून्य कल्पना का, 
चक्र टूट फिर जावे। 
मैं' जब 'हम' हो जावे, 
'आप' जब 'तुम' हो जावे।
मन शान्ति हो जावे, 
काया रंग फिर पावे। 
मैं' जब 'हम' हो जावे, 
'आप' जब 'तुम' हो जावे। 
भाव और विचारों में, 
अपना-पन झलकावे। 
मैं' जब 'हम' हो जावे, 
'आप' जब 'तुम' हो जावे।
घिरे मनो के फेरो से, 
अकेलापन मिट जावे। 
मैं' जब 'हम' हो जावे, 
'आप' जब 'तुम' हो जावे।
बिगड़े संबंध, टूटे-नाते, 
फिर इक हो जावे।  
मैं' जब 'हम' हो जावे, 
'आप' जब 'तुम' हो जावे।
क्षमा, दया, करुणा, प्रेम, 
जन्म यहि से पावे। 
मैं' जब 'हम' हो जावे, 
'आप' जब 'तुम' हो जावे।
जमी धूल की परतों से, 
अवगुण धूल जावे। 
मैं' जब 'हम' हो जावे, 
'आप' जब 'तुम' हो जावे।
दम्भ दूर हो जावे, 
अपूर्ण पूर्ण हो जावे। 
मैं' जब 'हम' हो जावे, 
'आप' जब 'तुम' हो जावे।

-आशुतोष सिंह चौहान 




Tuesday, 11 October 2022

🚩मर्यादित राम🚩

राम, 
सिया - राम, सिया - राम 
जय - जय राम! 
जन्म अयोध्या में पाकर,
रघु कुल के वंश वृक्ष बने ! 
माँ कौशल्या धन्य हुई,
दशरथ के तुम अंश बने! 
भरत लक्ष्मण शत्रुघ्न से, 
तीन प्रतापी भाई मिले! 
गुरु वशिष्ठ का ज्ञान मिले, 
प्रेम रूप सीता को पाया! 
राज तिलक के समारोह में, 
माँ कैकयी का अभिशाप मिला! 
पितृ आज्ञा के पालन में, 
14 वर्ष का वनवास मिला! 
अहिल्या को स्पर्श मात्र से, 
अभिशाप बंधन से मुक्त किया! 
सबरी की सेवा - पाकर, 
मन भावों को पूर्ण किया! 
सूर्पनखा के हठ की खातिर, 
सीता का अपहरण हुआ! 
सीता की खोज में, 
सुग्रीव, विभीषण जैसा मित्र मिला! 
हनुमान जैसा भक्त मिला, 
रावन का तारण करके! 
जन मानस को तृप्त किया, 
लव-कुश जैसे अंश मिले! 
इन सब गुणों को पाकर, 
फिर मर्यादित राम बने! 

राम, 
सिया - राम, सिया - राम
जय - जय राम! 

-आशुतोष सिंह चौहान 

Tuesday, 11 May 2021

मेला

मेला आया मेला आया, 
बच्चे फिरते फूले-फूले।
मेले में वो जाएंगे ,
चाट पकौड़ी खाएंगे।
खेल-खिलौने लाएंगे, 
दृश्य कई मेले में देखे ।
सर्कस देखा तम्बू वाले,
झूला-झूले चकरी वाले।
कई मिले जाने अनजाने,
अपना-पन बढ़ता मेले से।
प्रेम का रंग चढ़ता मेले में,
मेला जब भी आता है ।
मन को खूब लुभाता है, 
मेला आया मेला आया।

-आशुतोष सिंह चौहान 

Monday, 26 April 2021

माँ

रोते - रोते जो हँसा दे,
उसका नाम है माँ।
चिंता में भी हो मस्ती करा दे, 
उसका नाम है माँ।
जब हर कोई हमे गलत समझे, 
उस वक़्त जो साथ निभाये वो है माँ।
चाहे हजार बहाने बना लो पर, 
उन बहानो के बाद भी जो खाना खिलाए वो है माँ।
हर सुख - दुःख में जो साथ रहती हैं, 
उस रिश्ते का नाम है माँ।
जब वक़्त थम जाये, दूर जाने का डर सताये,
इसी प्यारे रिश्ते का नाम है माँ। ❣️💕❣️

-तृप्ति सिंह (सिया) 

PC- Ashutosh Singh Chauhan 

Saturday, 25 July 2020

मेरी प्यारी बहना

खुशियो रूपी सागर में ही आपकी जीवन-कश्ती हो। 
सदा वही स्पर्श करे, जिस हवा में  बस्ती बसती  हो। 
जीवन की इस पुस्तक में बस, सुख से भरी कहानी हो। 
दिन आए बार - बार ये , जब तक  सागर में पानी हो। 
बहार हो तेरे आँगन में , दामन में बस प्यार हो। 
हृदय से जन्म-दिवस पर बारम्बार बधाई। 
इरादे नेक, विचार श्रेष्ठ हो , अमल आपकी बात हो। 
झीलों में ऐसा पुष्प हो कि हर पल मन हर्षाऐ। 
पूरी सदा हो ख्वाहिशें, सदा किस्मत  आपके साथ हो 
चमक सदा हो चेहरों पर , दूरी न हो रिश्तों में 
कर्म बुरे न हो जीवन में , हर पल सदा भलाई हो
हृदय से जन्म-दिवस पर बारम्बार बधाई।

-आशुतोष सिंह चौहान

Wednesday, 2 October 2019

पूछे बेटी पिता से, जन्म पर मेरे आँसूं बहाओगे तो नहीं।

पूछे बेटी पिता से,
                          जन्म पर मेरे आँसूं बहाओगे  तो नहीं।
जन्म पर  मेरे खुशियाँ मनाओगे,
                                             गम में डूब जाओगे तो नहीं।
मांगू जो प्यार आपका तो ,
                                     नफरत जताओगे तो नहीं।
चाहूँ मैं अगर पढ़ना तो,
                                   इंकार कर जाओगे तो नहीं।
चाहूँ मैं अधिकार बराबर का तो,
                                              भेदभाव जताओगे  तो नहीं।
जब हो गयी जवान तो,
                                  विवाह कर सूली चढ़ाओगे तो नहीं।
फूलों की तरह पाली इस बेटी को,
                                                 काँटों पे बिठाओगे तो नहीं।
कर पराया इस बेटी को,
                                 भूल जाओगे तो नहीं।
पूछे बेटी पिता से,
                          जन्म पर मेरे आँसूं  बहाओगे तो नहीं।




                                           - आशुतोष सिंह चौहान 

Thursday, 5 September 2019

अर्जुन के लक्ष्य विभेद में, द्रोण को पहचानिए।

अर्जुन के लक्ष्य विभेद में, द्रोण को पहचानिए। 

झरनो के जल झंकार में, 
मेरु शिल को जानिए। 
अर्जुन के लक्ष्य विभेद में, 
द्रोण को पहचानिए। 
नदियों की बहती एक अथक धार,  
चलती मधुर एक साज पर।  
सागर से होता मिलान कैसे, 
रहती नहीं जो ढाल पर। 
ग़र कोई आगे बढ़ा है ,
अपने कदमो में खड़ा है। 
होती है कोई ढाल  ही, 
जिसने उसे पहचान दी। 
उस नदी की धार पर,
उस ढल को  पहचानिए। 
अर्जुन के लक्ष्य विभेद में, 
द्रोण को पहचानिए। 
  ज्ञान के संचार की,
बिन गुरु नहीं परिकल्पना। 
औरों की तो बात क्या, 
भगवन ने भी गुरु चुना। 
कृष्ण में संदीपनी को,
वशिष्ठ को राम में जानिए। 
अर्जुन के लक्ष्य विभेद में, 
द्रोण को पहचानिए। 
झरनो के जल झंकार में, 
मेरु शिल को जानिए। 
अर्जुन के लक्ष्य विभेद में, 
द्रोण को पहचानिए।

                                  -  आशुतोष सिंह  



#कवि संदीप द्विवेदी