Sunday, 30 March 2025

शक्ति स्वरूपा माँ नव-दुर्गा


प्रथम शैलपुत्री भवानी, स्नेह सुधा रस बरसाए।
धैर्य, शांति की दानी माता, भक्त विपद-हर जाए॥

ब्रह्मचारिणी तेज अनोखा, ज्ञान से जीवन महके।
तप से तप्त हृदय में माता, शीतलता बरसा रखे॥

चंद्रघंटा रण में कूदी, सिंह सवार विकराल बनी।
जो भी शत्रु बढ़ा सामने, रक्त धार से भूमि धनी॥

कूष्मांडा माँ सृष्टि विधाता, तेज से नभ को भरती।
सूर्य प्रभा सम रूप इनका, जो भी देखे, सुधरती॥

ममता की छवि संग विराजीं, स्कंदमाता दुलार करें।
भक्त पुकारे, माँ को ध्यावे, झोली सुख से तार भरें॥

कात्यायनी रण की देवी, शक्ति का संचार करें।
महिषासुर का मान हराकर, जग में नव आभार भरें॥

कालरात्रि क्रोध की ज्वाला, देख सुरासुर कांपे।
भक्त चरण में शीश झुकाकर, चरण-कमल पर लिपटे॥

महागौरी शांति स्वरूपा, रूप उजास अपार भरे।
जो भी प्रेम सुमन चढ़ावे, माँ के नयनों में नीर झरे॥

सिद्धिदात्री पूर्ण करुणा, नव निधि का संचार करें।
जो भी भक्त नमन कर लाए, भाग्य सुधा रस धार भरें॥

नव रूपों की ज्योति चमकती, पर्व नवरात्रि पावन हो।
डोले मृदंग, बजे घड़ियाली, माता की गूँजे वंदन हो॥

जय दुर्गे, जय माँ भवानी, शक्ति रूपिणी संकट हरो।
भक्ति सहित शीश नवाते, कृपा करुणा रस मन धरो॥

                               🙏🚩🙏

-आशुतोष सिंह 

Tuesday, 18 March 2025

प्रेमाभा:- भाव - मंजरी

यह पद्य आठ भागों में क्रमशः है - जो इसी पद्य का भाग है, इसलिए सभी का एक साथ पाठन करे। 

   1. श्रद्धा 
भाव तरंगित मन के भीतर,
मौन पलों में गूँज उठी, 
प्रिय स्मृतियों की मधुर सुरभि,
जैसे धरा पे मेघ झुकी।

नयनों में कुछ सपने जागे, 
हृदय हुआ बेसुध, अधीर, 
शब्द विहग बन उड़ते मन में, 
प्रेम लहर का मधुर नीर ।

        2. आशा
शीतल समीर सहलाने लगी,
कम्पित पत्तों की हरियाली, 
नभ से झरते चांद उजाले, 
बनते मन की मधुर लाली।

पलकों पर थी कोमल आशा, 
सांसों में अनकहा गीत,
मन के मंदिर में दीपक-सा, 
प्रेम जलाकर हुआ पुनीत। 

        3. स्मृति 
हृदय गगन में स्वप्न सजे थे,
चुपके से कुछ कहती रात, 
तारों की वह मौन झिलमिल, 
जागे मन में मधुर बात। 

बाँसुरी की धुन में खोकर, 
थम गए सब व्याकुल भाव, 
प्रेम की उस मधुर गली में, 
बस गया अनजाना चाव। 

        4. विरह 
चन्द्र किरण भी थककर सोई, 
सागर लहरे मौन हुई, 
मन की गहराई में फिर से, 
प्रेम कथा अनुपम बही। 

नभ से झरतें सपनों के रंग, 
धरती ने भी अंग लगाए, 
प्रेम पथिक बन, मैं अकेला, 
तेरी राहों में खोता जाऊ।
        5. वेदना 
मौन निशा की छाव में बैठा, 
चंचल मन कुछ कहने को, 
स्वरहीन गीतों में डूबा, 
तेरे रूप को गढ़ने को। 

तरु की छाया शांत खड़ी थी, 
शशि की किरणें गुप्त रही, 
सांसे तक धीमी हो आई,
पलकों में स्मृतियां बही। 

        6. समर्पण
प्रणय सुधा का कण - कण लेकर, 
मन पथिक नित भटक रहा, 
तेरी छवि के रश्मि पथ पर,
प्रेम दीप फिर जगमग रहा। 

हर धड़कन में गूँज रही है, 
संग तेरे वो प्रिय पुकार, 
काल भी झुककर नमन करे, 
प्रेम बने अमर अपार। 

        7. आनंद 
नभ में तारक दीप जले,
मन में उजियारा सा छाया, 
तेरे चरणों में लिपटा प्रेम, 
ज्यों पवन केश ने सहलाया। 

श्वास स्वप्न हो, प्राण समर्पण, 
तेरा प्रेम बस प्राण बने, 
इस जीवन की हर गहराई, 
तेरे चरणों की धूल तले। 

        8. अमरत्व 
अब न कुछ कहना, न सुनना,
केवल तेरा ध्यान रहे, 
तेरे प्रेम में खोकर प्रिय, 
बस तेरा ही नाम रहे। 

काल मिटे, सृष्टि सिमटे, 
प्रेम धरा पर गूँज उठे,
तेरे संग यह जीवन मेरा,
अमर प्रेम बन झूम उठे।

आशुतोष सिंह
18.03.2025

Thursday, 13 March 2025

प्रेम - पर्व :- होली

होलिका की ज्योति में, मिटे मनों के भार,

जलें विकार-अहं सभी, शुभ हो नए विचार।

रंग बरसे आसमाँ से, प्रीत भरे पैगाम,

हँसी-मजाक की बौछारें, छू लें हर इक धाम॥


अंग-अंग रंगीन हो, थिरके मन बेध्यान,

स्नेह सुधा की धार में, बहें पुराने मान।

फागुन की इस मस्ती में, घुली मिठास अपार,

गले मिले हर हृदय 4444 4444 r4 4|t4, नेह बने आधार॥

आओ रंगों में घुले, स्नेह-सुरभि के भाव,

प्रेम पिएं इस होली

पर, मिटे सभी दुराव।

नव उमंग, नव गीत हों, छूटे मन के बंध,

रंगों संग66 उड़ जाएं सब, कलुष, द्वेष और क्रंद॥

Thursday, 2 January 2025

प्यारी - नानी

नानी की ममता है अनमोल,
प्यार भरा जैसे मधुर रस घोल।
उनकी गोद में सुख का घर,
दूर हो जीवन के सारे डर।
कहानी सुनाएँ वो चाँद-सितारों की,
सिखाएँ हमें बातें जीवन के तारों की।
हर सुबह की पूजा, हर रात का गीत,
उनके संग बचपन हुआ मनमीत।
रसोई में गूँजे उनकी हँसी,
हर निवाले में सजी प्रेम की मिष्ठि।
उनके हाथों का स्वाद अनोखा,
स्नेह से महका हर कोना।
उनकी यादें दिल में बसतीं,
जैसे खुशबू फूलों से रसती।
नानी, तुम हो जीवन का दर्पण,
तुमसे सीखा सच्चा अनुकरण।

Thursday, 23 May 2024

लड़की एक स्यानी : अनकही सी कहानी

बन्द कमरा सहमी आवाज
वो अंधेरी काली रात 
चुपके से एक इन्सान आया 
हाथ उसने ओर बढ़ाया 
डरी सहमी नींद से जागी
उठ खड़ी हो दूर वो भागी 
नाकाम रही वो, पकड़ा था कसकर
एक हाथ पंहुचा सीने पर 
दूजे से साध मुँह को दबाया 
कान में फुस - फुसाकर
डर का माया जाल बनाया 
आवाज कुछ पहचानी थी 
वह थी उसके अपनों की
सहमी सिसकी पूरी रात 
दर्द में तड़पी पूरी रात
लोग कहेंगे क्या? डर से 
कभी नहीं कह पाती 
लड़की एक स्यानी
अनकही - सी कहानी 
किस्सा कैसे बताती 
याद करके सहम जाती 
दिखाती सीने के घाव कैसे? 
तो इज्जत उसी की उछल जाती 
सुनाओ कहानी सबकों ये 
लड़की को सामान नहीं 
सम्मान समझना 
लोग कहेंगे क्या? डर से 
मत सहना जिस्म पर 
हाथ किसी का।
बन्द कमरा सहमी आवाज 
वो अँधेरी काली रात 

Tuesday, 7 May 2024

गिरगिट


मानव समाज का केंद्र बिन्दु है तो उसकी बातचीत उसे समाज में बने रहने का साधन है। मानव की बातचीत का माध्यम ही तय करता है कि वह केंद्र में होगा या नहीं। बातचीत के भी दो माध्यम होते हैं, जिससे दो विचारधाराओं का जन्म होता है - स्पष्टवादी 
                                             चाटुकार या चापलूस 

पहली विचारधारा उन मानवों कि है जो आज के समाज में विलुप्तता कि कगार पर हैं। ये ये लोग हैं जिनकी बातचीत स्पष्टवादिता का आँचल पकड़े हुए रहती है। जो आज के समाज और उनके लोगों को तीखी, नुकीली और कटुतापूर्ण लगती है। परंतु सत्य तो यह है कि इनकी बात में तथ्यों कि सत्यतता होती है. जो गिरगिट की तरह रंग बदलाव नहीं करती है यह अपने ही संत्य और स्पष्टवादिता के रंग में रंगी रहती है। बातचीत का झुकाव व्यक्तिपरक या स्थितिपरक न होकर तथ्यपरक होता है। ऐसे लोग आज के समाज और उनके लोगों को फूटी आँख भी नहीं सोहते हैं। आज के समाज ने ऐसे लोगों को मुँहफट की संजा दी है।

दूसरी विचारधारा, पहली विचारधारा के पूर्णतः विपरीत हैं। यह उन मानव की जाति है, जिनका स्पष्टवादिता और सत्यता से कोसो दूर का नाता नहीं है। इनकी बातचीत का झुकाव व्यक्तिपरक और समाजपरक होता है। यह समाज की स्थिति और लोगों की प्रस्थिति के अनुरुप गिरगिट की तरह अपने बातचीत का सुर बदल लेते हैं। ऐसे लोग अपना स्वार्थ साधना ही परम लक्ष्य मानते हैं।

आज के समाज में ऐसे ही लोगों का बहुमत है, और इन्हें चापलूस या चाटुकार की संज्ञा दी गयी है और इस कार्य को चाटुकारिता।

आज के समाज में पहली विचारधारा के लोग भूसे में सुई ढूँढने जैसे हो गए है। कमी केवल इस बात की नहीं की लोग स्पष्टवादी विचारधारा के नहीं, कमी इस बात की है की आज का समाज ऐसे लोगों को तवज्जो न देकर उन्हें कुंठापूर्ण हीन भावना से देखती है। आज के समाज चाटुकारिता के नशे में मदहोश है जिसका परिणाम यह हैं की चापलूसों या चाटुकारों का बगीचा फल-फूल रहा है।

ये (चापलूस या चाटुकार) लोग समाज और उसकी व्यवस्था के लिए उस मीठे जहर की तरह है जो धीरे धीरे जीवन को समाप्त कर देता है और यह लोग संबंध, समाज और उसकी व्यवस्था को समाप्त कर देते हैं।

Tuesday, 7 March 2023

आस्था (faith)


विश्वास भरे मन अधरों से, 
नारायण - भक्त पुकार किए ।

धर नरसिंह रूप रचयों, 
प्रकट भय खंड खम्भों से ।


देख नारायण रूप विकराल। 
मची सभा में हाहाकार, 

राज भवन की चौखट पर, 
रख जंघन पर चीर दिए ।


हिरण्यकश्यप - संहार किए
अहम् सब चकनाचूर हूए। 


- आशुतोष सिंह "चौहान"